Friday, September 30, 2022

Ramadan का महीना – Ramzan में क्या इबादतें जरूरी हैं

Ramadan मुसलमानों का एक अफजल तरीन महीना है, इसमे मुसलमानों के द्वारा दिन में 30 रोज़े रखे जाते हैं और रातों को इबादत की जाती है। इस रोज़े में न तो कुछ खाना होता है और ना ही पीना। सुबह के पहले पहर के मुकर्रर वक़्त पर सहरी करके रोज़े की शुरुआत की जाती है और शाम में इफ्तार करके रोज़े को खोला जाता है, यही सिलसिला पूरे 30 दिनों तक चलता है। 30 दिनों के बाद रमज़ान का महिना खत्म होने पर ईद (Eid-ul-Fitr) मनाई जाती है।

जब Ramadan की पहली रात आती है तो शैतान और सरकश जिन जकड़ दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, इनमें से कोई भी दरवाजा खोला नहीं जाता। और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं, इनमें से कोई भी दरवाजा बंद नहीं किया जाता। फ़रिश्ते पुकारते हैं “ऐ खैर के तलबगार! आगे बढ़ (यानि ज्यादा से ज्यादा नेक अमल कर) और बुराई के तलबगार रुक जा (यानि गुनाहों से रुक और आइंदा गुनाह करने से सच्ची तौबा कर)” और अल्लाह बहुत से लोगों को आग से आजाद करता है, और ऐसा रमज़ान की हर रात को होता है। (ترمجی شریف حدیس نمبر 682)

 

Ramadan का क्या मतलब है?

Ramadan को Ramzan भी बोला जाता है, Ramadan के बहुत से मतलब और मीनिंग बयान किए गए हैं लेकिन असल अरबी ज़बान में रमज़ान का मतलब “झुलसा देने वाला या जला देने वाला होता है।” इस माह का यह नाम इसलिए रखा गया है की इस महीने में अल्लाह अपनी रहमत और अपने अफजल और करम से बंदों के गुनाहों को झुलसा देते है और जला देते हैं, और इसी मकसद के लिए अल्लाह ने ये महिना मुकर्रर फरमाया है।

Ramadan Ki Ibadat

ग्यारह महीने दुनियावी कारोबार, दुनियावी धंधों मे लगे रहने के नतीजे में गफलतें जो दिल पर छा गईं और इस अरसे में जिन गुनाहों और खताओं का एरतेकाब हुआ, इनको अल्लाह के सामने हाजिर होकर बखशवा लो और गफलत के परदों को दिल से उठा दो, ताकि ज़िंदगी का एक नया दौर शुरू हो जाए। इसलिए अल्लाह ने कुरान करीम के सूरह बकरा में फरमाया है की “यह रोज़े तुम पर इसलिए फर्ज कीये गए हैं की तुम्हारे अंदर तकवा पैदा हो जाए।”

Ramadan के महीने का असल मकसद यह है की साल भर के गुनाहों को बखशवाना, और गफलत के हिसाब दिल से उठाना और दिलों में तकवा पैदा करना, जैसे किसी मशीन को कुछ समय इस्तेमाल किया जाए तो इस के बाद इसकी सर्विस करवानी पड़ती है इसी तरह अल्लाह ने इंसान की सर्विस और ओवरऑइलिंग के लिए रमज़ान का महिना मुकर्रर फरमाया है ताकि इस महीने अपनी सफाई करवाकर अपनी ज़िंदगी को एक नई शक्ल दिया जा सके।

इसलिए सिर्फ रोज़े रखने और तरावीह पढ़ने की हद तक बात खत्म नहीं होती बल्कि इस महीने का तक़ाज़ा ये है की इंसान अपने आप को इस महीने में दूसरे कामों से फ्री कर ले। इस लिए की ग्यारह महीने तक ज़िंदगी के दूसरे काम में लगे रहे लेकिन यह महिना इंसान के लिए इस के असल मकसद तखलीक की तरफ लौटने का महिना है, इसमे अपना वक्त ज्यादा से ज्यादा अल्लाह की इबादत में खर्च करें और इस के लिए इंसान को पहले से रेडी होना चाहिए।

 

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Ramadan के आने से पहले क्या करें?

आज कल आलमे इस्लाम में एक बात चल पड़ी है जिस की शुरुआत अरब मुल्कों खास कर मिश्र से हुई और फिर दूसरे मुल्कों में भी फैल गई। वो ये है की रमज़ान शुरू होने से पहले कुछ महफिलें इकट्ठा होती है जिसका नाम “महफिले इस्तिकबाल रमज़ान” रखा जाता है। जिस में रमज़ान से एक दो दिन पहले एक इजतेमा किया जाता है, जिसका मकसद लोगों को यह बतलाना होता है की हम रमज़ान का इस्तिकबाल कर रहें हैं और इसका वेलकम कर रहे हैं।

Ramadan मुबारक के इस्तिकबाल का यह जज़्बा बहुत अच्छा है लेकिन यही अच्छा जज़्बा जब आगे बढ़ता है तो कुछ अरसा के बाद ये बिदत की शक्ल इख्तियार कर लेता है, चुनानचे बहुत जगहों पर इस इस्तिकबाल की महफ़िल ने बिदत की शक्ल इखतेयार कर ली है।

रमज़ान मुबारक का असल इस्तिकबाल यह है की रमज़ान आने से पहले अपने निजाम और वक़्त बदल कर ऐसा बनाने की कोशिश करें की इस में ज्यादा से ज्यादा वक़्त अल्लाह की इबादत में लगाई जाए। Ramadan का महिना आने से पहले यह सोचो की यह महिना आ रहा है किस तरह से अपनी व्यस्त ज़िंदगी कम कर सकता हूँ। अगर कोई शख्स अपनी मशरुफियत से बिल्कुल फारिग नहीं हो सकता तो फिर वो यह देखे की कौन कौन से काम इस महीने छोड़ सकता हूँ, इनको छोड़े और किन मशरुफियत को कम कर सकता है इनको कम करे, और रमज़ान के ज्यादा से ज्यादा वक़्त को इबादत में लगाने की फिक्र करे।

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Ramadan में क्या अमल और इबादत करें?

Ramadan बेशक हर महीनों से अफ़जल महिना है, इसमें जितनी हो सके अल्लाह की इबादत में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए। हमें ये हर हाल में कोशिश करनी चाहिए की अल्लाह हमारे पिछले गुनाहों को माफ करके हमें पाक साफ कर दे। रमज़ान में क्या क्या इबादत करनी जरूरी है इसके बारे में मैं आपको नीचे बता रहा हूँ।

Ramadan Iftar

1. पूरे रोज़े रखें

Ramadan में आपको 30 दिनों में पूरे रोज़े रखना जरूरी है, रोज़ा हर बालिग मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज़ है और इसके किसी भी बिना मतलब के छोड़ने पर गुनाह है। इसलिए अगर हम पूरी तरह से सेहतमंद हैं और दूसरी कोई और मजबूरी नहीं है तो पूरे रोज़े रखने का एहतेमाम करना चाहिए। रोज़े रखने का मतलब सिर्फ भूखे और प्यासे रहना नहीं है इसमे हमें अपने नफ़्स पर कंट्रोल, खुद अपने जिस्म पर कंट्रोल, हर तरह की खवाहिश पर कंट्रोल करना, बुरे कामों पर लगाम लगाना और साथ साथ नाजायज़ और जायज़ कामों पर भी अपने अल्लाह की रज़ा की खातिर कंट्रोल का नाम रोज़ा है।

2. Quran की तिलावत करें

कुरान पाक रमज़ान के महीने में ही नाज़िल हुआ है, ये महिना सभी ये लिए रहमत और बरकत का है, इस महीने में अल्लाह ने Quran शरीफ को दुनिया की राहबरी के लिए भेजा था। इस Ramadan के महीने हमें कसरत से कुरान पाक की तिलावत करनी चाहिए। हमें कोशिश करनी चाहिए की कम से कम एक पारा रोज़ कुरान पढ़ें जिससे पूरे रमज़ान से पहले एक कुरान मुकम्मल हो जाए।

3. तारावीह पढ़ें 

पूरा दिन रोज़ा रखने और इफ्तार करने के बाद एक और इबादत तारावीह है, तारावीह पढ़ना वाजिब है। ईशा की नमाज़ के बाद तारावीह मस्जिद में जमात के साथ 20 रकात तारावीह पढ़ी जाती है, जिसमे कुरान पाक की तिलावत को सुना जाता है। इसका एहतेमाम करें।

4. पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ें

नमाज़ तो मुसलमानों पर पूरी ज़िंदगी फर्ज है, लेकिन अगर कोई नमाज़ न पढ़ता हो या वक़्त न दे पाता हो तो उसे चाहिए की रमज़ान में इसकी एहतेमामत करें, और कोशिश करें की इसे आदत बना कर पूरी ज़िंदगी पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ना शुरू कर दें। अल्लाह से माफी मांग कर ज़िंदगी की नई शुरुआत एक नमाज़ी के तौर पर करें।

5. नेक अमल करें

रमज़ान में कसरत के साथ नेक आमाल करें नेक आमाल से मुराद है की आप जो भी नेक आमाल करते हैं उसमें इजाफा कर दें जैसे की गरीब को तोहफे दें, उनकी मदद करें, उन्हें खाना खिलाएं, इफ्तार करवाएं, माल खर्च करके नेक चीजों में लगाएं जितनी हो सके कसरत के साथ।

6. सदका खैरात करें

ये भी नेक आमाल में ही आता है लेकिन इसमे आपको खास तवज्जो देना चाहिए, अपने माल खर्च करें और जिनहें जरुरत हो उन्पर करें और बिल्कुल खुलकर करें, बिना कंजूसी के आपको जितना अल्लाह में सलाहियत दी है उतना जरूर करें और खासकर इस रमज़ान के महीने में फरागत के साथ सदका खैरात करें।

70. तौबा और इस्तिगफार

रमज़ान में अल्लाह के रसूल कसरत से तौबा और इस्तिगफार किया करते थे, रमज़ान मगफिरत का महिना है, कहा गया है की वो बदनसीब ही है जिसने रमज़ान का महिना पाया और उसने अपनी मगफिरत न करवायी। इसलिए हमें अल्लाह से अपनी गलतियों की माफी की तौबा और कसरत से इस्तिगफार करना चाहिए।

8. लैलतुल कद्र में क़याम

रमज़ान के आखिरी असरे में पाँच ऐसी रातें बताई गई हैं जिनसे से एक लैलतुल कद्र की रात होती है, जिनमे से 21, 23, 25, 27 और 29 की रात है। इन रातों में जागकर लैलतुल कद्र में क़याम करना चाहिए और इन रातों में लैलतुल कद्र की असल रात को ढूँढना चाहिए जो की हजार रातों से बेहतर रात है।

9. इतेक़ाफ पर बैठना

इतेक़ाफ का अर्थ है मस्जिद या घर में केवल अल्लाह की इबादत के लिए अलगाव में रहना। रमजान के आखिरी 10 दिनों में एतिकाफ में बैठना सुन्नत-अल-मुअकीद है। एक व्यक्ति रमजान की 20 तारीख को सूर्यास्त के बाद एतिकाफ शुरू कर सकता है और ईद का चांद दिखने पर इसे खत्म कर सकता है।

मर्द के लिए मस्जिद में एतिकाफ करना अनिवार्य है, जहां वे जमात में सभी पांच नमाज़ अदा कर सकते हैं। महिलाएं मस्जिद में भी एतिकाफ पर बैठ सकती हैं यदि उनके पास गोपनीयता और आवश्यक सुविधाएं हों। अन्यथा, वे घर पर ही कर सकती हैं।

10. दुआओं का इहतेमाम

रमज़ान में कसरत से दुआ करने का हुक्म अल्लाह के रसूल ने दिया है। आपको अपने गुनाहों की माफी की दुआ के साथ साथ अपनी जाएज मांग की दुआ भी करना चाहिए। अल्लाह इस रेमत के महीने में सब मोमीनो की दुआओं को सुनता है और कबूल करता है।

11. ज़कात देना

वैसे ज़कात अदा करने का तो साल भर वक़्त होता है लेकिन ज्यादातर लोग रमज़ान में ही ज़कात देना पसंद करते हैं। वैसे ज़कात निसाब के हिसाब से उस माल पर फर्ज़ है जिस पर 355 दिन रखे हुए हो चुके हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा है तो आप रमज़ान में ज़कात दे सकते हैं इससे एक तय वक़्त मुकर्रर हो जाएगा।

12. फ़ितरे का अदा करना 

Eid की नमाज़ से पहले आपको अपने लोकैशन के हिसाब से तय किया हुआ फ़ितरे को देना वाजिब है। आपको गरीब औरत मिसकीन लोगों को फ़ितरा देना चाहिए ताकि उनकी भी ईद अच्छे से हो जाए। इस्लाम में सबका ख्याल रखा गया है। इसे जरूर पूरा करें।

जैसा के सब लोग समझते हैं, Ramadan सिर्फ रोज़े रखने और तारावीह पढ़ने का महीना नहीं है। लोग बोलते हैं की रमज़ान में हम रोज़े रख रहे हैं बस लेकिन ये सिर्फ एक रमज़ान की इबादत का हिस्सा है-

“ये एक शांति और सुकून देने वाला महिना है।”

“ये बीमारियों से निजात दिलाने वाला महिना है।”

“ये अच्छाइयों का महिना है।”

“ये माफी और तौबा मांगने वाला महिना है।”

“ये जन्नत को हासिल करने वाला महिना है।”

“ये कुरान के नाज़िल होने का महिना है।”

रोज़ा का अर्थ क्या है?

Ramadan मुसलमानों का एक अफजल तरीन महीना है, इसमे मुसलमानों के द्वारा दिन में 30 रोज़े रखे जाते हैं और रातों को इबादत की जाती है। इस रोज़े में न तो कुछ खाना होता है और ना ही पीना। सुबह के पहले पहर के मुकर्रर वक़्त पर सहरी करके रोज़े की शुरुआत की जाती है और शाम में इफ्तार करके रोज़े को खोला जाता है।

रमज़ान की सच्चाई क्या है?

Ramadan को Ramzan भी बोला जाता है, Ramadan के बहुत से मतलब और मीनिंग बयान किए गए हैं लेकिन असल अरबी ज़बान में रमज़ान का मतलब “झुलसा देने वाला या जला देने वाला होता है।” इस माह का यह नाम इसलिए रखा गया है की इस महीने में अल्लाह अपनी रहमत और अपने अफजल और करम से बंदों के गुनाहों को झुलसा देते है और जला देते हैं, और इसी मकसद के लिए अल्लाह ने ये महिना मुकर्रर फरमाया है।

रमज़ान क्यूँ मनाया जाता है?

Ramadan मुसलमानों का एक अफजल तरीन महीना है, इसमे मुसलमानों के द्वारा दिन में 30 रोज़े रखे जाते हैं और रातों को इबादत की जाती है। इस रोज़े में न तो कुछ खाना होता है और ना ही पीना। सुबह के पहले पहर के मुकर्रर वक़्त पर सहरी करके रोज़े की शुरुआत की जाती है और शाम में इफ्तार करके रोज़े को खोला जाता है, यही सिलसिला पूरे 30 दिनों तक चलता है। 30 दिनों के बाद रमज़ान का महिना खत्म होने पर ईद (Eid-ul-Fitr) मनाई जाती है।

मुस्लिम रोज़ा क्यूँ रखते हैं?

Ramadan के महीने का असल मकसद यह है की साल भर के गुनाहों को बखशवाना, और गफलत के हिसाब दिल से उठाना और दिलों में तकवा पैदा करना, जैसे किसी मशीन को कुछ समय इस्तेमाल किया जाए तो इस के बाद इसकी सर्विस करवानी पड़ती है इसी तरह अल्लाह ने इंसान की सर्विस और ओवरऑइलिंग के लिए रमज़ान का महिना मुकर्रर फरमाया है ताकि इस महीने अपनी सफाई करवाकर अपनी ज़िंदगी को एक नई शक्ल दिया जा सके।

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